अपना देश भी कितना अदभुत है? एक तरफ भाजपा की कार्यकारिणी अपने अधिवेशन में नरेंद्र मोदी को नोटबंदी पर हार्दिक बधाई दे रही है और दूसरी तरफ भारत के प्रमुख सांख्यशास्त्री देश की आर्थिक दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं। भारत के मुख्य सांख्यशास्त्री टीसीए अनंत का कहना है कि भारत का सकल उत्पाद (जीडीपी) इस साल 0.5 प्रतिशत घट गया है। याने 7.6 से वह 7.1 प्रतिशत रह गया है। देखने में यह आंकड़ा बहुत छोटा लगता है- सिर्फ आधा प्रतिशत लेकिन इसे जरा फैलाएं तो अपने आप मालूम पड़ जाएगा कि भारत की अर्थव्यवस्था को कितना बड़ा झटका लगा है। आधा प्रतिशत की कमी का अर्थ है- लगभग 8 लाख करोड़ का झटका। भारत की कुल नगद मुद्रा के 50 प्रतिशत से भी ज्यादा है, यह राशि ! यह झटका अक्तूबर 2016 तक का है। नोटबंदी का भस्मासुर उतरा है, नवंबर और दिसंबर 2016 में। अभी इसका मूल्याकंन आना बाकी है लेकिन अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि इससे उबरने में लंबा वक्त लगेगा। अभी किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही, यह बताने की कि 2017 में देश के सकल उत्पाद (जीडीपी) में कितनी कमी होनेवाली है। जब नोटबंदी पर बोलते हुए डाॅ. मनमोहनसिंह ने संसद में कहा कि जीडीपी अब 2 प्रतिशत घट जाएगी तो मुझे लगा कि वे विरोधी नेता हैं, इसीलिए ऐसा बोल रहे हैं लेकिन सारा देश जानता है कि वे अर्थशास्त्र के पंडित हैं और रिजर्व बैंक के गवर्नर भी रहे हैं। यदि सचमुच देश की जीडीपी यदि दो प्रतिशत या थोड़ी ज्यादा घट गई तो देश की अर्थव्यवस्था को संभलने में कई वर्ष लग जाएंगे। करोड़ों लोग बेकारी, भुखमरी और गरीबी के शिकार हो जाएंगे। जैसे मोदी की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान ने हमारे सीमांत पर दर्जनों सर्जिकल स्ट्राइकें कर दीं और 100 से ज्यादा लोगों को मार दिया, वैसे ही यह नोटबंदी भी फर्जीकल स्ट्राकल ही सिद्ध हो रही है। लेकिन कमाल है, हमारे भाजपा नेताओं की बोलती ही बंद है। कार्यकारिणी की इस बैठक में सब बैठे ही रहे। कोई खड़ा नहीं हुआ। किसी ने खड़े होकर कान नहीं खीचे। किसी ने यह नहीं पूछा कि तुमने देश को नोटबंदी के इस मूर्खतापूर्ण चक्कर में क्यों फंसाया और इतना आत्मघाती कदम उठाने के पहले किसी से क्यों नहीं पूछा? देश की लगभग सभी पार्टियां (कांग्रेस समेत) प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां बन गई हैं लेकिन भाजपा में तो सदा आंतरिक लोकतंत्र रहा है। मैंने कार्यकर्ताओं को बड़े से बड़े नेताओं के साथ जूझते हुए देखा है। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कड़ी निगरानी भी बनी रहती थी लेकिन अब लगता है कि नोटबंदी के साथ-साथ भाजपा में जुबानबंदी का भी दौर शुरु हो गया है। देश के लोकतंत्र के लिए यह खतरे की घंटी है।


Author
Ved Pratap Vaidik
www.vpvaidik.com

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