शीर्षक देखकर शायद आपको अटपटा लगे या फिर आपको लगे कि ये केवल एक मजाक है किन्तु सत्य यही है कि राहुल गांधी निरंतर किसानों के लिए आवाज़ उठाते रहे है। राहुल गांधी नेहरू गांधी परिवार से आते है, एक ऐसा परिवार जिसने तीन प्रधानमंत्री दिए। ऐसा लगता है कि ऐसे परिवार से आना राहुल गांधी का सौभाग्य है, किन्तु कोई यह नही देखता की इस परिवार ने क्या क्या झेला है। शुरू से ही संघ के लोगो ने इस परिवार के प्रति दुष्प्रचार किया कि यह परिवार केवल सत्ता भोग के लिए है, पर शायद संघ यह नही जानता कि अकेले इस परिवार ने पूरे संघ परिवार से ज्यादा त्याग किये गए है।

2004 में जब राहुल गांधी जब राजनीति में आये तो विपक्ष ने इन्हें युवराज कह कर बुलाया, कहा कि इनका बचपन केवल मौज मस्ती में बिता है, किन्तु विपक्ष यह भूल गया कि इसी राहुल गांधी ने 14 वर्ष की उम्र में अपनी दादी को और 21 वर्ष की उम्र में अपने पिता को देश के लिए बलिदान देते हुए देखा है। इनका बचपन में स्कूल की पढ़ाई घर पर करनी पड़ी एवं कॉलेज में नाम बदलकर रहना पड़ा।

जब जब राहुल गांधी ने किसानों की बात उठाई तो इनका मजाक उड़ाया गया, कुछ लोगो ने कहा कि वह उडद की दाल और मूंग की दाल में फर्क नही बात सकते,तो कुछ ने कहा कि उन्हें गेहू के खेत ओर गन्ने के खेत मे फर्क नही पता, पर राहुल गांधी को कोई फर्क नही पड़ा, उनका उद्देश्य केवल किसानों का हित है।

जब भी मोदी सरकार में राहुल गांधी ने किसानों की बात की तब तब उनपर आरोप लगाए की वो केवल सत्ता के लिए किसानों की बात कर रहे है किंतु वो मनमोहन सिंह की सरकार में सत्ता में रहते हुए भी लगातार किसानों के हित के लिए लड़ते रहे है, और उनकी सादगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2008 में जब वो राजस्थान में मनरेगा मजदूरों से मिले तो खुद उनके साथ मिलकर तसले से मिट्टी डालते रहे और बताया कि कोई काम बड़ा या छोटा नही होता।

2008 में ही महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार होते हुए भी उन्होंने विदर्भ में किसान की विधवा कलावती की आवाज़ संसद में रखी और उनके जरिये परमाणु शक्ति में विविधता की जरूरत को समझाकर बताया कि अगर आपको सीखना है तो जरूरी नही की आप केवल सूट बूट वालो से सीखो, आप किसी से भी सिख सकते हो चाहे वो मजदुर ही क्यो न हो, किन्तु विपक्षी सांसदों ने उस समय न केवल राहुल गांधी का मजाक उड़ाया, बल्कि कलावती को भी नही छोड़ा। प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने उपहास उड़ाते हुए कहा कि गुजरात मे कलावती जैसी नही रहती। 2015 में जब कलावती जी पूछा गया कि क्या वो प्रधानमंत्री से मिलना चाहेगी तो उन्होंने कहा नही, उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने गरीबो के लिए बहुत कुछ किया है, मोदी सरकार केवल छीन रही है और उन्हें पूरा विश्वास है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री जरूर बनेंगे।

2011 में भट्टा परसौल के आंदोलन को कोन भूल सकता है जब राहुल गांधी उत्तर प्रदेश सरकार की किसान विरोधी नीति जिसमे किसानों की जमीन छीनकर उद्योगपतियों को औने पौने दामो में देने के विरोध में खड़े हो गए,पुलिस ने सरकार के इशारों पर राहुल गांधी को गिरफ्तार कर लिया पर वो रुके नही और फिर से भट्टा परसौल जाकर किसानों से मिले। 2012 चुनाव में करारी हार के बावजूद राहुल गांधी ने देश भर में किसानों से,पंचायतों में जाकर बात की, किसानों की परेशानियों को समझा एवं वर्षो से अटके भूमि अधिग्रहण बिल 2013 को लाने में अहम भूमिका निभाई जिसमे जमीन अधिग्रहण से पहले न केवल 80% किसानों की सहमति चाहिए और साथ ही मुआवजा भी 4 गुना दिया जाएगा।

2014 मे जब मोदी सरकार सत्ता में आयी,तब तीन बार मोदी जी ने भूमि अधिग्रहण बिल को कुचलने की कोशिश की पर राहुल गांधी ने संसद से लेकर सड़क तक संघर्ष किया और बार बार मोदी सरकार की इस किसान विरोधी नीति को रोका और बाद में मोदी सरकार को किसान हिट में झुकना पड़ा।

लगातार 2 साल मानसून खराब होने से किसानों को नुकसान हुआ और किसानों की आत्महत्या की दर दुगनी हो गयी पर केंद्र सरकार का किसानों पर कोई ध्यान नही गया, मोदी सरकार ने न तो अपने वादों के अनुसार फसलों पर MSP दुगना किया गया और न ही कोई आर्थिक मदद दी गयी पर उद्योगपतियों का 1.28 लाख करोड़ का कर्ज माफ कर दिया गया तब राहुल ने ही 15 km की पदयात्रा तेलंगाना में की और पीड़ित परिवार को 2 लाख रुपये की सहायता दी।

राहुल गांधी ने ही उप्र में 28 दिन की किसान यात्रा करके किसानों की हालत पर देश का ध्यान दिलाया,इन्होंने न केवल कर्जमाफी के लिए 2 करोड़ किसानों के हस्ताक्षर लिए पर उन्हें मोदी जी के पास उस समय लेकर गए जब विपक्षी दल मोदी सरकार की नोटबन्दी के विरुद्ध लामबंद थे, विपक्षी दलों ने उनकी इसपर राहुल गांधी की आलोचना भी की पर राहुल गांधी के लिए सबसे पहले किसानों की समस्या का हल था।

वो राहुल गांधी का ही दवाब था कि जो भाजपा को उप्र के चुनावी घोषणापत्र में कर्ज माफी का वादा करना पड़ा और राहुल गांधी के आंदोलन के डर से ही सत्ता में आने तक पहली कैबिनेट मीटिंग एक महीने तक टालनी पड़ी और कर्ज माफी करनी पड़ी।

बड़े राज्यो, पंजाब और कर्नाटक में जहाँ कांग्रेस कि सरकार थी वहां न केवल कर्ज माफी हुई, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए कमिटी भी बनी. तमिलनाडु के किसान जब दिल्ली में एक महीने तक अनशन किया तब भी राहुल गांधी उनसे मिलने सबसे पहले आये पर केंद्र सरकार की और से कोई नही गया।

मंदसौर में जब मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने किसान आंदोलन में 5 किसानों को गोली मार दी और उन्हें किसान मानने से इनकार कर दिया क्योंकि कुछ किसानों ने जीन्स पहनी थी, तब राहुल गांधी ने किसान परिवार से मिलने की इज्जाजत मांगी पर अपनी विफलताओं को छुपाने के लिए शिवराज सरकार ने अनुमति नही दी,तब राहुल गांधी ने मंदसौर जाने की ठान ली और मप्र सरकार ने उन्हें रोकने के लिए 1000 पुलिसकर्मी को लगा दिया तब राहुल गांधी ने अपनी सुरक्षा की चिंता न करते हुए मोटरसाइकिल से पुलिस को चकमा दे दिया और खेतों से मंदसौर की तरफ बढ़ गए, और पैदल भी चले जहां उन्हें मधुमक्खी ने काट लिया पर वो बढ़ते गए और मंदसौर की सीमा पर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, जहां राहुल गांधी ने जमानत लेने से मना कर दिया और पुलिस को राहुल गांधी को पीड़ित परिवार से मिलाने पर मजबूर होना पड़ा।

भाजपा और संघ के दुष्प्रचार के बावजूद अब किसान समझ गए है कि भाजपा ने बड़े वादे कर केवल उनको ठगा है और अब उनकी निगाह केवल राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ही है, वो कांग्रेस पार्टी जिसने वैश्विक मंदी के वक्त किसानों का पूर्ण कर्ज माफ करके न सिर्फ किसानों को बल्कि पूरे देश को मंदी से बचाया। और वो राहुल गांधी जिसे किसानों के साथ देने के लिए अपनी सुरक्षा की चिंता भी नही करते। अब देश की निगाहें है तो सिर्फ किसानों के प्रति बड़े जन आंदोलन का।
जय हिन्द, जय भारत

This article is authored by Yash Gupta @yashgupta1202 . CA student and a Political Observer

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