“मै आईना हूं दिखाऊंगा दाग चेहरों के”

“जिसे नागवार लगे सामने से हट जाए”

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। देश का यह स्वतन्त्रता संग्राम एक किसी भी एक विशेष वर्ग के प्रयासों से सफल नहीं हुआ।स्वतंत्रा की यज्ञ में प्रत्येक धर्म प्रत्येक वर्ग के लोगो ने अपने प्राणों की आहूति दी तब जाकर एक स्वतंत्र भारत का निर्माण हुवा। बाबा भीमराव अंबेडकर के अनेक देशों के अध्ययन हेतु यात्रा व्रतांत एवं अथक प्रयासों से 26 जनवरी 1950 को स्वतंत्र भारत के गढ़तंत्र की गाथा परिपूर्ण हुइ। 

भारत के स्वन्त्रता काल से ही भारत कही न कही दंगो में भी झुलसता रहा। कुछ दंगे के बारे मे लोग कहते है कि प्रायोजित थे तो कुछ दंगे धार्मिक भावनाओ के ज्वारभाटे मे बह कर हुए। कुछ दंगो ने इस प्रकार विकराल रूप धारण कर लिया की उन दंगो की लपटों में संपूर्ण भारत जलने लगा और पूरे देश मे अस्थिरता फैल गई। हम आज बात करेंगे उन दंगो की जिसने पुरे देश को सर्मशार किया। हम बात करेंगे उन दंगो की जिसने हमेशा के लिए सियासत पे दाग लगा दिया।भारत में आज़ादी के बाद हज़ारों दंगे हुए हैं, जिनमें हज़ारों लोग मारे गए हैं. चूंकि आरोप ये लगते हैं कि सांप्रदायिक दंगे या तो प्रशासन की लापरवाही की वजह से होते हैं या फिर राजनेताओं के इशारों पर, इसलिए दंगा करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई पर भी सवाल उठते हैं.

1- 1984 के सिख दंगे

ये दंगे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद शरू हुई। 31 अक्टूबर 1984 को उनके ही एक सिख अंगरक्षक ने बहुत ही करीब से 12 गोलियाँ मारकर उनकी निर्मम हत्या कर दी। हत्या के वक़्त उनके पुत्र राजीव गांधी आसाम गए हुए थे और तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह भी दिल्ली से बाहर थे। प्रशाशनिक प्रयासों के बाद भी बीबीसी हिंदी ने इंदिरा गांधी के मौत की खबर प्रकाशित कर दी जिसके बाद दिल्ली पंजाब मे ही नही पुरे देश मे सिखों के खिलाफ हिंसा भड़क गई।देशब्यापी इस हिंसा मे करीब 4000 लोग मारे गए और 10000 लोग घायल हुए। प्रशाशन ने तो उन दंगो पर काबू पा लिया परंतु इस मे लिप्त लोगो मे से बमुश्किल कुछ लोगो को ही सजा हो पायी। 1984 के इस दंगो मे सिखों का मानना है कि उन्हें अभी भी इन्साफ नही मिला है। राजनितिक पार्टियों ने दंगो का राजनीतिकरण कर दिया। जिसपर हर पार्टी का प्रत्येक चुनाव मे राजनीती करना बदस्तूर जारी है।

2- बाबरी मस्जिद विध्वंस–1992

बाबरी मस्जिद उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के अयोध्या शहर में स्थित थी। मस्जिद के पास (भारतीय जनता पार्टी, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस) द्वारा एक रैली आयोजित की गई। रैली के आयोजकों द्वारा मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचाने देने की भारत के सरवोच्च न्यायालय से वचनबद्धता के बावजूद, 1992 में 150,000 लोगों की एक हिंसक रैली के दंगा में बदल जाने से यह विध्वस्त हो गयी।मुंबई और दिल्ली सहित कई प्रमुख भारतीय शहरों में इसके फलस्वरूप हुए दंगों में 3,000 से अधिक लोग मारे गये। इन दंगों मे मारे जाने वाले अधिकतर मुसलमान ही थे। सिर्फ मुम्बई में ही एक हजार से ज्यादा मुसलमान मारे गए। जिनकी जाँच के लिये सरकार ने श्रीकृष्ण आयोग का गठन किया। श्रीकृष्णा आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट में अहम अभियुक्तों की एक सूची तैयार की थी, लेकिन एक हज़ार से ज़्यादा इंसानों के क़त्ल के एक भी व्यक्ति को सज़ा नहीं दी जा सकी।

बाबरी मस्जिद विध्वंस की संपूर्ण जाँच के लिये लिब्रहान आयोग का गठन किया गया। 30 जून 2009 को आयोग ने प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी। विध्वंस के लिए रिपोर्ट ने भारत सरकार के उच्च पदस्थ अधिकारियों और हिंदू राष्ट्रवादियों को दोषी ठहराया. 6 दिसम्बर 1992 को कार सेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद विध्वंस के दिन जो कुछ भी हुआ था, लिब्रहान रिपोर्ट ने उन सिलसिलेवार घटनाओं के टुकड़ों कों एक साथ गूंथा था।

रविवार की सुबह लालकृष्ण आडवाणी और अन्य लोगों ने विनय कटियार के घर पर मुलाकात की. रिपोर्ट कहती है कि इसके बाद वे विवादित ढांचे के लिए रवाना हुए. आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और कटियार पूजा की वेदी पर पहुंचे, जहां प्रतीकात्मक रूप से कार सेवा होनी थी, फिर आडवाणी और जोशी ने अगले 20 मिनट तक तैयारियों का निरीक्षण किया। दोपहर में, एक किशोर कार सेवक कूद कर गुंबद के ऊपर पहुंच गया और उसने बाहरी घेरे को तोड़ देने का संकेत दिया. रिपोर्ट कहती है कि इस समय आडवाणी, जोशी और विजय राजे सिंधिया ने “… या तो गंभीरता से या मीडिया का लाभ उठाने के लिए कार सेवकों से उतर आने का औपचारिक अनुरोध किया। पवित्र स्थान के गर्भगृह में नहीं जाने या ढांचे को न तोड़ने की कार सेवकों से कोई अपील नहीं की गयी थी। रिपोर्ट कहती है: “नेताओं के ऐसे चुनिंदा कार्य विवादित ढांचे के विध्‍वंस को पूरा करने के उन सबके भीतर छिपे के इरादों का खुलासा करते हैं

रिपोर्ट का मानना है कि “राम कथा कुंज में मौजूद आंदोलन के प्रतीक … तक बहुत ही आसानी से पहुंच कर … विध्वंस को रोक सकते थे।”

विध्वंस में अग्रिम योजना बनाई गई

पूर्व खुफिया ब्यूरो (आईबी) के संयुक्त निदेशक मलय कृष्ण धर ने 2005 की एक पुस्तक में दावा किया कि बाबरी मस्जिद विध्वंस की योजना 10 महीने पहले आरएसएस, भाजपा और विहिप के शीर्ष नेताओं द्वारा बनाई गई थी और इन लोगों ने इस मसले पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव द्वारा उठाये गए कदम पर सवाल उठाया था। धर ने दावा किया है कि भाजपा/संघ परिवार की एक महत्वपूर्ण बैठक की रिपोर्ट तैयार करने का प्रबंध करने का उन्हें निर्देश दिया गया था और उस बैठक ने “इस शक की गुंजाइश को परे कर दिया कि उनलोगों (आरएसएस, भाजपा, विहिप) ने आनेवाले महीने में हिंदुत्व हमले का खाका तैयार किया और दिसंबर 1992 में अयोध्या में ‘प्रलय नृत्य’ (विनाश का नृत्य) का निर्देशन किया।.. बैठक में मौजूद आरएसएस, भाजपा, विहिप और बजरंग दल के नेता काम को योजनाबद्ध रूप से अंजाम देने की बात पर आपसी सहमति से तैयार हो गए।” उनका दावा है कि बैठक के टेप को उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अपने बॉस के सुपुर्द किया, उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा कि उन्हें इसमें कोई शक नहीं है कि उनके बॉस ने उस टेप की सामग्री को प्रधानमंत्री (राव) और गृह मंत्री (एसबी चव्हाण) को दिखाया. लेखक ने दावा किया है कि यहां एक मूक समझौता हुआ था जिसमें अयोध्या ने उन्हें “राजनीतिक लाभ उठाने के लिए हिंदुत्व की लहर को शिखर पर पहुंचाने का एक अद्भुत अवसर” प्रदान किया।

लिब्रहान आयोग के निष्कर्ष

न्यायमूर्ति मनमोहन सिंह लिब्राहन द्वारा लिखी गयी रिपोर्ट में मस्जिद के विध्वंस के लिए 68 लोगों को दोषी ठहराया गया है – इनमें ज्यादातर भाजपा के नेता और कुछ नौकरशाह हैं। रिपोर्ट में पूर्व भाजपा प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और संसद में पार्टी के तत्कालीन (2009) नेता लालकृष्ण आडवाणी का नाम लिया गया हैं। कल्याण सिंह, जो मस्जिद विध्वंस के समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, की भी रिपोर्ट में कड़ी आलोचना की गयी। उन पर अयोध्या में ऐसे नौकरशाहों और पुलिस को तैनात करने का आरोप है, जो विध्वंस के दौरान मूक बन कर खड़े रहे. लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में राजग सरकार में भूतपूर्व शिक्षा मंत्री मुरली मनोहर जोशी को भी विध्वंस में दोषी ठहराया गया है। एक भारतीय पुलिस अधिकारी अंजू गुप्ता अभियोजन गवाह के रूप में पेश की गयीं. विध्वंस के दिन वे आडवाणी की सुरक्षा प्रभारी थीं और उन्होंने खुलासा किया कि आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी ने भड़ाकाऊ भाषण दिए। हजारो लोगो के कत्ल समुदाय विशेष की भावनाये आहत करने का अपराध करने वाले सफेदपोश अपराधियो पर सत्ता के प्रयोग से कोई विशेष कार्यवाही नही हो सकी। जो आज भी आजाद हो कर इस हिंदुस्तान की फिजा मे जहर घोल रहे है।

3- गोधरा, गुजरात के दंगे-2002

गुजरात के दंगे भारत के इतिहास में पहले ऐसे दंगे थे जिनकी जीती जागती ख़ौफ़नाक तस्वीरें लोगों ने टीवी के माध्यम से पहली बार प्रत्यक्ष रूप से देखी थी। आज हम आपको उसी खुनी कहानी का कुछ अंश बताते है।

27 फरवरी को सुबह सुबह गोधरा मे ट्रेन जला कर कारसेवको की हत्या हुई। 27 फरवरी शाम तक पूरे गुजरात मे कहीं कोई हिंसा नहीं। 27 फरवरी को VHP और बजरंग दल गुजरात सरकार को ट्रेन जलाने वालों के खिलाफ कठोर कार्यवाही करने की मांग करते है। 28 फरवरी की सुबह तक यानि ट्रेन जलाए जाने के 24 घंटे बाद तक पूरे गुजरात मे कोई दंगा नहीं होता।28 फरवरी की जुलूस की शक्ल मे लाशों को शमशान ले जाया जाता है और धार्मिक भावनाएं उभारी जाती हैं। 28 फरवरी की शाम से पूरे गुजरात मे दंगे शुरू होते हैं जो लगभग 1 महीने चलते है। दंगे गोधरा कांड के लगभग 36 घंटे बाद शुरू होते हैं। जो बताता है की दंगा प्रायोजित था और पूरी तैयारी से किया गया था। फौज के आने पर दंगा कंट्रोल किया जाता है। फौज की गोलियों से सैकड़ों दंगाई मारे जाते हैं। गोधरा कांड के तुरंत बाद पूरे गुजरात मे सुरक्षा व्यवस्था अगर कड़ी कर दी गयी होती तो पूरे गुजरात को दंगो की आग में जलने से बचाया जा सकता था।मगर मगर प्रशाशन ने कोई भी कड़ा रुख अपनाना बेहतर नहीं समझा ताकि दंगाईयो को खुलेआम दंगा करने का रास्ता मिल सके ।प्रशाशन ने कोई कार्यवाही इस लिए नहीं की  VHP और बजरंग दल की धमकी के तौर पर प्रशाशन को सरेआम दंगो की सुचना मिल चुकी थी। प्रशाशन ने दंगाईयो को 27 फरवरी को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार नहीं किया गया कि VHP और बजरंग दल के कार्यकर्ता रूपी आतंकवादियो को प्रतिशोध स्वरुप दंगा करने का  खुला अधिकार मिल सके। उस वक़्त केंद्र में भी भाजपा की ही सरकार थी अगर प्रदेश सरकार चाहती तो तुरंत केंद्रीय बलो की मदद से दंगे रोक सकती थी मगर राज्य सरकार को इस में एक महीने से भी ज्यादा वक़्त गुजर गए। सारे बिंदुओं को देखने से यही लगता है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने कही इन दंगो को प्रायोजित किया था जिसका आभास पुरे देश की जनता को गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को नरेंद्र को तो राजधर्म निभाने तक की सलाह देनी पड़ी। जिसने साबित किया कि नरेंद्र मोदी या तो स्वयं इन दंगों के प्रयोजक थे या एक अक्षम मुख्यमंत्री और प्रशासक साबित हुये। क्या ये सब यह नहीं दिखाता की गुजरात सरकार खुद नहीं चाहती थी की दंगे कंट्रोल हों। मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके विरोधी ये मांग करते रहे हैं कि वो गुजरात में 2002 में हुए दंगों में एक हज़ार से ज़्यादा मुसलमानों के मारे जाने के लिए माफ़ी मांगें. पर सियासत तो बेशर्म है “साहेब”

गुजरात में दंगो के बाद स्थिति थी की मानवाधिकार संगठनों की मदद से दंगा पीड़ितों ने रिपोर्ट दर्ज कराई. लेकिन एक के बाद एक सारे केस ढह गए। आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से दंगों के मामलों को दोबारा जांच हुई और इससे जुड़े मुकदमों में अब तक सैंकड़ों कसूरवारों को सज़ा मिल चुकी हैं। इनमें मोदी सरकार में मंत्री रहीं माया कोडनानी भी शामिल हैं।

4- मुजफ्फर नगर दंगे-2013 (27 अगस्त 2013 से 17 सितम्बर 2013)

27 अगस्त 2013 के कवाल गाँव में जाट -मुस्लिम हिंसा के साथ यह दंगा शुरू हुआ जिसके कारण लगभग 100 लोगो की मृत्य हुयी मगर सरकारी आंकड़ों में इसे 60 बताया गया। दंगे मे 2000 से ज्यादा लोग हताहत हुए। हजारो की संख्या में लोगो के घरों के फूंक दिया गया। लगातार 22 दिनों तक मौत का नंगा नाच चलता रहा। 100 से भी ज्यादा लोगो को जिन्दा जला दिया गया। सौ से भी ज्यादा औरतो के साथ बलात्कार हुवा (इस कड़वे सच को प्रशाशन नही मानता)। जिसमे 100 लोगो की गिरफ्तारी हुयी दस हजार लोगो को नजरबंद हुये। 17 सितंबर को दंगा प्रभावित हर स्थानों से कर्फ्यु हटा लिया गया और सेना वापस बुला ली गयी। मुजफ्फर नगर दंगो का सारा श्रेय उत्तर प्रदेश की सरकार को जाता है। अगर सरकार चाहती तो वक़्त पे त्वरित कड़ी कार्यवाई कर के दंगों को फैलने से रोका जा सकता था। कार्यवाई के नाम पर कुछ लोगो को गिरफ्तार किया। मगर इतनी बर्बादियों के लिये सिर्फ कुछ लोग जिम्मेदार नही हो सकते। सबसे बड़ी शर्म की बात ये है कि उन गिरफ्तार हुए लोगो पर भी कोई विशेष कार्यवाही नहीं हो सकती। हर बार की तरह दंगो के आग पे राजनीति की रोटियाँ सेकी गयी।

शुरुआती झड़पें 
जाट और मुस्लिम समुदाय के बीच 27 अगस्त 2013 से प्रारंभ हुई। कवाल गाँव में कथित तौर पर एक जाट समुदाय लड़की के साथ एक मुस्लिम युवक की छेड़खानी के साथ यह मामला शुरू हुआ।उसके बाद लड़की के परिवार के दो ममेरे भाइयों गौरव और सचिन ने शाहनवाज नाम के युवक को पीट-पीट कर मार डाला को मार डाला। उसके बाद मुस्लिमों ने दोनों युवकों को जान से मार डाला। इसके बाद पुलिस ने दोनों तरफ के लोगों को गिरफ्तार कर लिया।
जनसभा
इसके दोनों तरफ से राजनीति शुरु हो गई। मारे गए दोनों जाटो युवकों के इंसाफ के लिए एक महापंचायत बुलाई गई। महापंचायत में भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेताओं ने जाट समुदाय को बदला लेने को उकसाया। भारतीय जनता पार्टी के एक विधायक पर दंगो के भड़काने के मकसद से एक वीडियो वायरल करने का आरोप भी लगा जिसे लोग सच भी मानते है। महापंचायत में उग्र प्रदर्शन किया गया। इस प्रदर्शन में लोगो को इतना उकसाया गया कि मुस्लिम बस्तियों से गुजरते हुए गोलियां चलने लगी। देखते ही देखते पूरा मुजफ्फर नगर, शामली और आस पास के क्षेत्रो में दंगे शुरू हो गए। लगातार 22 दिनो तक जारी इन दंगों को रोकने में प्रशाशन पूरी तरह नाकाम रहा।
कार्यवाही
दंगा फैलने के बाद शहर में कर्फ्यु लगा दिया गया और सेना के हवाले शहर कर दिया गया। 1000 सेना के जवान, 1000 पी.ए.सी. के जवान, 1300 सी.आर.पी.एफ. के जवान और 1200 रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों को शहर की स्थितियों पर नियंत्रण करने के लिए तैनात कर दिया गया।

11 सितम्बर 2013 तक लगभग 10 से 12 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया। 2300 शस्त्र लाइसेंस रद्द किये और 7 लोगों पर रा.सु.का के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज हुआ। पर ये सब करवाईया सरकार ने दिखावे के लिए अपने बचाव के लिए किया था जबकि सच यह है कि सभी गुनाहगार आज भी आजाद है।

नुकसान

दंगों में बड़ा नुक़सान हमेशा अल्पसंख्यकों का होता है। हर दंगा कही न कही सियासत द्वारा ही प्रायोजित होता है। भारत की राजनीति में भी बहुसंख्यक समाज का पूर्णतया अधिकार है। जिससे बहुसंख्यक दंगाईयो को दंगा करने की राजनितिक छूट भी मिली रहती है। अल्प संख्यको की न तो अपनी कोई बड़ी पार्टी है न ही किसी भी सरकार में सहभागिता इस लिये शाशन का भी इन्हे कोई समर्थन नही मिल पाता। भारत मे हुये हजारो दंगे इन तथ्यों की विश्वश्नियता दर्शाते है।

राजनितिक दंश

भारत के जिस भी शहर मे दंगे हुए वहाँ की विपक्ष की पार्टियों ने सत्तापक्ष की नाकामी बताया, जंगलराज बताया और सत्तापक्ष का विरोध किया। हर विपक्ष की पार्टी दंगा रोकने के लिए सत्तापक्ष से कानून बनाने का मांग करती हैं। जब वही विपक्ष सत्ताधारी हो जाता है तो अपने ही सभी मांगो को भूल जाता है। क्योंकि हकीकत यही रहता है कि इतना विरोध पीड़ितों के मदद के लिए नही सिर्फ सत्ता मोह के लिए होता है। मगर किसी भी दंगा पीड़ित के लिए किसी भी राजनितिक पार्टी ने कुछ नही किया होगा। वही सत्ता पक्ष और विपक्ष की पार्टिया अगर चाहे तो एक संयुक्त बिल पास कर के दंगों के लिए कानून बना सकती हैं। मगर लड़ाई तो सिर्फ सत्ता के लिये और सत्ता के दुरूपयोग के लिये है साहब ?

न एजेंडा, न दिलचस्पी

ख़ुद को सेक्युलर कहने वाले लालू यादव बिहार के भागलपुर में 1989 के दंगों के बाद सत्ता में आए थे, लेकिन उन्होंने पंद्रह साल की अपनी सत्ता में दंगा पीड़ितों के लिए कुछ नहीं किया.

बिहार में नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद इस मामले में मुकदमा चला और कइयों को सज़ा हुई, साथ ही दंगा पीड़ितों को मुजावज़ा मिला.

मेरठ के मालियाना और हाशिमपुरा मोहल्ले के तक़रीबन पचास लोगों का क़त्ल का आरोप पीएसी के जवानों पर लगा, लेकिन कार्रवाई पर अब भी सवाल क़ायम हैं हाल में उत्तर प्रदेश के मुलायम की सरकार ने अभियुक्त जवानों के ख़िलाफ़ मुकदमा चलाने में कोई दिलचस्पी नहीं ली.

गुजरात और 1984 के दंगे, बाबरी विध्वंस और राम मंदिर के लिए जारी राजनीति के बीच कोई ये मांग नहीं कर रहा है कि मुज़फ़्फ़रनगर में दंगा करने वालों को गिरफ़्तार किया जाए और उन्हें सख़्त सज़ा दी जानी चाहिए.

ये न किसी का एजेंडा है और न ही किसी को इसमें दिलचस्पी है.

कांग्रेस का प्रयास

यही नहीं, राजनीतिक पार्टियां अपने कार्यक्रमों में दंगों के अभियुक्तों का नागरिक अभिनंदन करती हैं. ऐसे लोग दो चार दिन की हिरासत के बाद रिहा हो जाते हैं.

कांग्रेस ने अपने पहले कार्यकाल अपने घोषणापत्र में सांप्रदायिक दंगों की रोकथाम और पीड़ितों की प्रभावी मदद के लिए एक क़ानून बनाने का वादा किया था.

जब उसके नेतृत्व वाली सरकार का दूसरा कार्यकाल ख़त्म होने को आया तो कांग्रेस ने एक बिल संसद में पेश किया.

इस बिल में बहुत सारी कमियां थीं जिन्हें बहस के ज़रिए आसानी से दूर किया जा सकता था लेकिन सभी पार्टियों ने कोई न कोई बहाना बना कर एकजुट होकर इसे ख़ारिज कर दिया.

सांप्रदायिक दंगे भारत के रंग बिरंगे लोकतंत्र पर कलंक हैं। दंगाईयो के लिए कोई प्रभावी कानून न होने से  पिछले 30-35 बरसों से हज़ारों क़ातिल बेख़ौफ़ घूम रहे हैं.

उन्हें फिर किसी गुजरात किसी अयोध्या किसी मुज़फ़्फ़रनगर की तलाश है और राजनीती पार्टियों को आरोप प्रत्यारोप करने का अवसर।

मेरा किसी भी राजनितिक पार्टी से कोई जायज या नाजायज सम्बन्ध नही है एक आम भारतीय नागरिक की हैसियत से सच बोलना मेरा अधिकार है।

 

साहिल “नादान”

@najarul25 (Follow on Twitter)

Email-sahil0935@gmail.com

Comments

SHARE
mm
मेरी सोच है पत्रकारिता स्वतंत्र होनी चाहिए। मै कड़वा लिखता हूं क्यों कि सच लिखता हूँ। मेरे लेखों पर फर्जी सेकुलर भक्तो की भावना आहत हो सकती है। ऐसे लोगो को मेरे पोस्ट से दूर रहने की सलाह दी जाती है। मै आईना हूँ दिखाऊंगा दाग चेहरों के। जिसे नागवार लगे सामने से हट जाये।