National सामंतवाद की वापसी

सामंतवाद की वापसी

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PATNA - BHAGALPUR KA BANKA ME CHUNAVI SABHA KO SAMBODHAT KARTA P . M . NARANDAR MODI

 

भारतीय लोकतान्त्रिक इतिहास में 2014 का चुनाव भारतीय सामाजिक राजनितिक ऐतिहासिक घटना है। इस घटना को विशुद्ध राजनैतिक घटना और कहना की जनता कांग्रेस पर लगे आरोपो और उसकी कार्यप्रणाली से त्रस्त होकर भाजपा को पूर्ण बहुमत दे दिया गलत होगा। ये एक सामाजिक घटना भी थी बहुत से लोग चुनाव के बात मानने लगे की भारत हिंदूवादी हो गया है और साम्प्रदायिक हो गया गया है और भारत हिन्दू राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर हो गया है ये सोच भी बहुत हद्द तक अतिवादी है।

2014 में कांग्रेस की हार की समीक्षा करने के लिए हमें पिछले 100 साल की घटनाओ का अवलोकन करना होगा। 19वी शताब्दी के पहले दशक में कांग्रेस अंग्रेज़ो के लिए मात्र एक ऐसा दल था जो उनकी नीतियों का विरोध करता था परंतु सम्पूर्ण भारत में उसका कोई ख़ास प्रभाव नहीं था।

1905 के बंगाल विभाजन की घटना ने पूर्वी भारत में राष्ट्रवाद को पनपा दिया था और तब से कांग्रेस ने एक जनांदोलन का रूप धारण किया और बंगाल को एकजुट करने के लिए ‘वंदे मातरम्’ का नारा दिया जो आज भी प्रचलित है। परंतु ये राष्ट्रवाद का स्वरुप बांग्लाभाषी क्षेत्र तक ही सीमित रहा।

1908 में तुर्की में युवा तुर्की दल ने शक्तिहीन खलीफा के प्रभुत्व का उन्मूलन खलीफा के पद की समाप्ति का प्रथम चरण था,परंतु भारतीय मुसलमानो पर इसका कोई खास प्रभाव नही पड़ा। किंतु 1912 में तुर्की-इतालवी तुर्की के विपक्ष में ब्रिटेन के योगदान इस्लामी संस्कृति पर प्रहार समझकर भारतीय मुस्लमान उत्तेजित हो उठे। 1916 में खिलाफत आंदोलन शरू हुआ क्योंकि प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटेन ने तुर्की पर आक्रमण किया था।

1919 में गांधीजी के प्रभाव से खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन एकरूप हो गए। गांधीजी ने और कांग्रेस ने आन्दोलन को सफल बनाने के लिए मुसलमानो को आश्वासन दिया की भारत के स्वाधीनता संग्राम में मुसलमानो के सहयोग को याद किया जायेगा और स्वाधीन भारत में उचित सम्मान और भागीदारी दी जायेगी। असहयोग आंदोलन से कांग्रेस के जनांदोलन का विस्तार हुआ और अंग्रेजी हुकूमत हिल उठी। परंतु अभी भी अंग्रेज़ो पर वह दबाब नहीं बन पाया था जिससे वो कांग्रेस के सामने घुटने टेक सके।

भारत की आबादी का एक प्रमुख भाग अब भी अस्पर्शता और छुआछूत से झूझ रहा था। हिन्दू धर्म की इस विसंगति पर महात्मा गांधी ने काफी काम किया और दलितों का आह्वान किया की वो स्वाधीनता संग्राम से जुड़े और उन्हें आश्वासन दिया की स्वाधीन भारत में उनके अधिकारो की रक्षा होगी और अस्पृश्यता खत्म करने के लिए कांग्रेस हर संभव प्रयास करेगी।

महात्मा गांधी ने भारत को आज़ाद कराने के लिये हर तबके का आह्वान किया यहाँ तक की वैश्या और अपराधियो से भी किया और उनको आश्वासन दिया की उनके अधिकारो की रक्षा होगी।

समस्त भारतीय समाज ने  कांग्रेस के नेतृत्व में अंग्रेज़ो से संघर्ष करके भारत को स्वाधीन कराया। महात्मा गांधी और कांग्रेस ने जो वादा देश के विभिन्न तब्को से किया उसको संविधान सभा ने भारत के संविधान में पूरा करने का हर संभव प्रयास किया।

voters--621x414दलितों को मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण,महिलाओ के लिये हिंदू कोड बिल,यहाँ तक की वैश्याओ की और अपराधियो के मानवाधिकार की रक्षा के लिए संवेधानिक प्रावधान रखे गए। बीते 67 साल में सामाजिक बदलाव हुए उसके लिए आरक्षण एक महत्वपूर्ण कारण रहा,परंतु कुछ दलित जातियो को छोड़ के अधिकांश दलित जातियो तक आरक्षण का लाभ नहीं पंहुचा और 1989 के मंडल आयोग के पश्चात् तो सक्षम जातियां भी आरक्षण की जद में आ गयी। इस से भारत में एक नये सामंतवादी वर्ग का उदय हुआ। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले  कांग्रेस ने महात्मा गांधी के विचारो और वादों को जिसमे वो सर्वहारा समाज के उत्थान की बात कहते थे उस पर काम किया।

चुनाव से पहले सच्चर कमिटी की रिपोर्ट आना मुसलमानो की दयनीय स्थिति तक पहुचे पिछड़ेपन और उन्हें आरक्षण देने तथा उच्च जातियो में आर्थिक रूप से पिछडो को आर्थिक आरक्षण की बात की गयी।  तो नए सामंती समाज को अपने लिए एक खतरा उत्पन्न होता दिखा तो वह समाज सामंतवाद की रक्षक भाजपा की ओर अग्रसर हो उठे और अपनी सामंतशाही को बचाने के लिये छदम हिंदू राष्ट्रवादी का आवरण ओढ़कर दक्षिपंथी ताकतों की गोद में जा बैठे।

2014 में भाजपा की जीत के मायने ये नहीं है की भारत हिंदु अतिवादि हो गया है और ये दक्षिपंथी ताकतों को जीत है,अपितु ये धर्मनिरपेक्ष समाजवादी ताकतों की सामंतवाद से हार थी। पिछले 67 साल में पनपा यही सामंतवादी समाज गरीब,दलित,पिछडो,अल्पसंख्यको,महिलाओ को अधिकार देने की मुखालफत करता है। यही समाज मनरेगा,फ़ूड सिक्यूरिटी एक्ट और सुचना के अधिकार का मखोल उड़ाता है।

यहि समाज जो हिंदुत्व के झंडे तले हर उस आवाज़ को दबाने का प्रयास करता है जो इनके सामंतशाही एजेंडे के खिलाफ बोलता है,चाहे रोहित वेमुला हो या कन्हिया ये समाज हर किसी को राष्ट्रद्रोही साबित करने पर तुला है,और पीछे से सरकार से 1 लाख करोड की छूट ले लेता है।

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