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खूब पीओ, खूब JIO’

कहते हैं कि ये पब्लिक है, सब जानती है। इसलिए ये पब्लिक कहने लगी है- ‘खूब पीओ, खूब जीओ।’ ये जुमला नहीं, सच्चाई है। आपको याद तो होगा ही कि हमारे प्रधानसेवक ने सार्वजनिक मंच से घोषणा की थी-‘न खाऊंगा, ना खाने दूंगा।’ दरअसल, ‘खूब पीओ, खूब JIO’ का नारा पब्लिक ने तबसे देना शुरू किया है, जबसे प्रधानसेवक जी द्वारा कथित रूप से JIO की ब्रांडिंग शुरू की गई है और उसे लाभ पहुंचाने के लिए 65,798 करोड़ रूपए के स्पेक्ट्रम की नीलामी की गई है।

 

जीएजी के अनुसार, इस नीलामी में 16,9647 करोड़ का घाटा सरकार हुआ है। अब सवाल यह है कि यूपीए सरकार में इसी तरह के स्पेक्ट्रम की नीलामी 65,436 करोड़ रू. में हुई थी, तब तत्कालीन सीएजी विनोद राय 1,70,000 करोड़ के घाटे की बात कही थी।

 

यदि वे सही थे तो मौजूदा केन्द्र की भाजपा सरकार में 16,9647 करोड़ का घाटा भी उसी तरह का है। इसी पर पब्लिक पूछ रही है क्यों भाई, ‘न खाऊंगा, ना खाने दूंगा’ वाली इस सरकार में घपला हुआ है कि नहीं हुआ है? जोर से कान में गूंजती हुई आवाज आ रही है, हां हुआ है। ये सरकार कि डूब-डूबकर पानी पी रही है। वो चाहती है कि एसी चोरी करें कि किसी को पता भी न हो और काम भी हो जाए। फिर तो यह नारा सटीक बैठ रहा है कि ‘खूब पीओ और खूब JIO’।

 

आपको बता दें कि JIO डिजिटल के शो रूमों में लगी लम्बी कतारें इस बात का जीता जागता सबूत है कि हमारे देश में कोई कुछ भी मुफ्त में दे, हममें से विरले ही होंगे, जो उसे नहीं लेना चाहेंगे। साथ ही बहुत कम लोग यह सोच पाएंगे कि आखिर यह मुफ्त का माल मिल क्यों रहा है?

कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया में छप्पन इंची सरकार के इसी नीलामी कारनामे की खूब चर्चा थी। पूर्ववर्ती सरकार पर लगाए गए आरोपों को खारिज करती रिपोर्ट तब के आरोपों पर सवाल खड़ा कर रही थी। साथ ही वर्तमान केन्द्र की मोदी सरकार के नीतियों पर सवाल भी उठा रही थी।

इसी क्रम में कल अचानक मुंबई के एक मित्र का फोन आया। कुशल क्षेम के बाद उन्होंने एक मासूम सवाल मुझसे किया, जिसने सोचने पर विवश कर दिया । पूछा कि भाई एक जीबी नेट पैक पर अभी तक आप सरकार को ये कंपनिया कितना टेक्स देती थी?

अंदाजा लगाकर मैंने कहा लगभग 24 रूपए। फिर मित्र ने कहा कि भाई इसे तीस जीबी से गुणा कर बताओ कि ये कितना बैठा? करीब 720 रूपये। उनकी बात और प्रश्न दोनों मेरी समझ में आ रहे थे। मैं समझ गया कि उनका इशारा किधर है? उन्होंने कहा अभी आप समझे कि नहीं कि अम्बानी ने सरकार को कितना चूना लगा दिया हैं?

 

एक आम आदमी की गणना और गहरी समझ को देख कर मैं चकित था। यूं कहें कि ये तो सीधे और आँखों के सामने मुफ्त कनेक्शन के नाम पर देश की तिजोरी पर डाका है। और हमारा चौकीदार है कि डाका डालने वाले के माल की ब्रांडिंग कर रहा है।

 

ये तो हद हो गई। ज़ाहिर सी बात हैं कि किसी भी मुफ्त सेवा पर कोई टेक्स नहीं होता। इस हिसाब से 1.5 करोड़ के कनेक्शन जो JIO ने मुफ्त बांटे उससे देश के राजस्व में स्पष्टतः 1180 करोड़ का नुकसान हुआ। दूसरे शब्दों में इसे घोटाला भी कह सकते हैं। ये घोटाला तो सिर्फ छङ माह का  आकलन हैं।

ये 3G, 4G किसान और मजदूर या रेहडी वाले या फिर मजलूमों के नसीब में शायद ही हो?

शायद ये आलेख जनता में जागरूकता लाये की मुफ्त सिम के नाम पर देश को किस तरह बड़े बड़े उद्योग पति लूटने की जुगत में लगे हैं और प्रधानमंत्री उनका सिम बेच रहे हैं। यदि ये उद्यमी देश को आर्थिक रूप से कंगाल करने की जुगत नहीं भिड़ाते तो शायद करोड़ों किसानों के कर्ज माफ हो जाते, न जाने कितने अस्पताल और स्कूल खूल जाते, लेकिन अब संभव नहीं।

फैसला आपके हाथ में है।

 

 

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indian national congress social media activist लेखक कवि सामाजिक चिंतक