ब्रिक्स में भारत की विफलता का राज बताएं मोदी :- राजा संजय  सिंह 

भारत में उड़ी हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में पाकिस्तान पर अलग-थलग पड़ने का खतरा मंडरा रहा था, लेकिन गोवा में हुए ब्रिक्स सम्मेलन ने पाकिस्तान को राहत दे दी है, जो भारत की बड़ी कुटनीतिक हार है। ब्रिक्स सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत के पड़ोस में “दहशतगर्दी का गढ़” है। तेजी से तरक्की करने वाली पांच अर्थव्यवस्थाओं ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के नेताओं के इस सम्मेलन में मोदी ने पाकिस्तान का नाम लिए बिना कहा कि ब्रिक्स को दुनिया भर में आतंकवादियों से संपर्क रखने वाले देश के खिलाफ एकजुट हो जाना चाहिए। फिर भी, ब्रिक्स के साझा घोषणापत्र में पाकिस्तान का कोई जिक्र नहीं है।

जानकार बताते हैं कि भारत को मालूम है कि ब्रिक्स देशों के अपने अलग हित हैं, लेकिन भारत ने अपने हिसाब से पाकिस्तान को घेरने की कोशिश की। ब्रिक्स बेशक एक आर्थिक समूह है लेकिन भारत ने इस समिट में यह बताने की कोशिश की है कि आर्थिक तरक्की के लिए जरूरी है कि माहौल आतंकवाद से मुक्त हो। गोवा के घोषणापत्र में जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए- तैयबा और सीमा पार आतंकवाद का जिक्र नहीं है। इन सब बातों से लगता है कि भारत जिस तरह से घोषणापत्र बनवाना चाहता था वो इसमें कामयाब नहीं हुआ। सम्मेलन के दौरान भारत के पुराने दोस्त रहे रूस का समर्थन भी उसे नहीं मिला। इसके अलावा भारत की आपत्तियों के बावजूद हाल में ही रूस की सेना ने पाकिस्तानी सेना के साथ साझा सैन्य अभ्यास किया है।

अब मुद्दा यह है कि 26 मई 2014 को केन्द्र में सरकार बनने के बाद से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार विदेश दौरे कर रहे हैं। विदेश दौरों से मोदी क्या हासिल कर रहे हैं इस बारे में वे तो कुछ नहीं कह रहे, पर अंधभक्त यह बताने से नहीं चुक रहे कि मोदी के विदेश दौरों से भारत की विदेश नीति मजबूत हो रही है। इसी मुद्दे को सवालिया अंदाज में आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व उत्तर प्रदेश प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष डा.संजय सिंह पूछते हैं-‘ढाई साल में हमने क्या हासिल किया? जब हर मोर्चे पर विफल ही होना है तो धुंआधार विदेश दौरे कर हजारों करोड़ रूपए का नुकसान क्या गया? इस संदर्भ में प्रधानमंत्री को बयान देना चाहिए।’

आपको बता दें कि पिछले दिनों ब्रिक्स सम्मेलन के बाद चीनी विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा था कि चीन हर तरह के आतंकवाद के खिलाफ है और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को आतंकवाद खत्म करने के लिए आपसी सहयोग बढ़ाना चाहिए। चीन ने कहा कि पाकिस्तान ने आतंकवाद के खिलाफ जंग में बहुत कुर्बानियां दी हैं और दुनिया को इनका सम्मान करना चाहिए। निश्चित रूप पाकिस्तानी चीन के इस बयान को पाकिस्तान की कूटनीतिक कामयाबी मानते हैं। साथ ही ब्रिक्स सम्मेलन से पहले भारत में जो बातें चल रही थीं, सम्मेलन के दौरान भारत वो हासिल नहीं कर पाया, इसे पाकिस्तान के लोग भारत की हार और पाकिस्तान की जीत मानकर चल रहे हैं।

भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार राजीव रंजन तिवारी भी गोवा में हुए ब्रिक्स सम्मेलन को पाकिस्तान के हक में बताते हैं। उनका कहना है कि ब्रिक्स में भारत ने पाकिस्तान की गैर मौजूदगी में उसे जमकर बुरा भला कहा लेकिन वो चीन और रूस जैसी बड़ी ताकतों को पाकिस्तान के खिलाफ बोलने के लिए मजबूर नहीं कर पाया। दूसरी तरफ पाकिस्तान में भी बहस चल रही है कि नॉन स्टेट एक्टर्स के खिलाफ कार्रवाई की जाए जो एक सकारात्मक बात है। इस समय भारत और पाकिस्तान के बीच सभी दरवाजे बंद हैं। कूटनीतिक और सांस्कृतिक तौर पर दोनों देशों के रिश्ते बिल्कुल थम गए हैं। ये न सिर्फ दोनों देशों का बल्कि इस पूरे क्षेत्र का बहुत बड़ा नुकसान है। ‘ब्रिक्स’ सम्मेलन को लेकर ऐसी हवा भारत में बनी थी जैसे इसमें शामिल देश पाकिस्तान को एक स्वर में अलग-थलग करने की बात करेंगे। मगर सम्मलेन के बाद अब सवाल उठने लगे हैं कि आखिर इससे मिला क्या? हालांकि ऐसी हवा को बनाने का ठीकरा मीडिया के सर ही फोड़ने की कोशिश की गयी मगर विदेश मामलों पर नज़र रखने वाले इसे भारत की कूटनीतिक चूक के रूप में भी देख रहे हैं।

अफ़ग़ानिस्तान और नेपाल में भारत के राजदूत रह चुके राकेश सूद मानते हैं कि भारत के लिए ‘ब्रिक्स’ सम्मलेन से हासिल वो सब कुछ नहीं हुआ जिसकी लोग उम्मीद किये बैठे थे। वो कहते हैं कि भारत में इस सम्मलेन को लेकर उम्मीदें बहुत ज़्यादा थीं। इसलिए लोग चर्चा भी कर रहे हैं। कूटनीतिक हलकों में इस सम्मलेन का नतीजा भी पहले से मालूम था। इतनी ‘हाइप’ की गयी मगर पहले ही मालूम था कि नतीजा कुछ ख़ास निकलकर नहीं आने वाला है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स के सदस्यों से आतंकवाद से निपटने के लिए निर्णायक कार्रवाई का आह्वान करते हुए पाकिस्तान को ‘आतंकवाद की जननी’ करार दिया था। इससे उम्मीद की जाने लगी थी कि सम्मलेन के समापन पर जारी किए जाने वाले साझा बयान में प्रधानमंत्री मोदी की उम्मीदों की झलक मिलेगी, मगर ऐसा नहीं हुआ।

इस साझा बयान में न तो उड़ी हमलों के बारे में कुछ कहा गया और न ही ‘पोषण’, ‘पनाह’, ‘समर्थन’ और ‘प्रायोजित’ जैसे शब्द ही साझा ‘गोवा डेक्लेरेशन’ का हिस्सा बने। साझे बयान में कहा गया है कि “आतंकवाद के वित्त पोषण के स्रोतों जैसे मादक पदार्थ की तस्करी, आपराधिक गतिविधियों जैसे संगठित अपराधों, आतंकवादी ठिकानों को नेस्तनाबूद करने के साथ ही आतंकवादी इकाइयों द्वारा सोशल मीडिया सहित इंटरनेट के दुरुपयोग पर बल दिया जाए। आतंकवाद से सफलतापूर्वक निपटने के लिए एक समग्र रुख की आवश्यकता है। आतंकवाद के खिलाफ कदमों में अंतरराष्ट्रीय क़ानून बरक़रार रखा जाना और मानवाधिकारों का सम्मान। इसी को लेकर राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में बहस छिड़ी हुई है। पर अफसोस कि इससे काम चलने वाला नहीं है। विपक्षी कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि ब्रिक्स के साझा बयान में पकिस्तान से संचालित चरमपंथी संगठनों का नाम तक नहीं लिया जाना ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ है।

लोकसभा चुनाव से पहले लम्बी-लम्बी फेंकने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से डा.संजय सिंह का सवाल जायज प्रतीत हो रहा है कि मोदी को यह बताना चाहिए तकरीबन ढाई साल की अपनी विदेश यात्रा में उन्होंने किस भारतीय कुटनीति को मजबूती दी है, जिससे राष्ट्र का मान-सम्मान बढ़ा है। डा.सिंह बताते हैं कि हर मोर्चे पर विफल मोदी सरकार केवल पब्लिक की अपेक्षाएं बढ़ा रही है, जो जनता की दुख का कारण बन रहा है। डा.सिंह ने एक और रहस्योद्घाटन किया कि ब्रिक्स सम्मेलन के विफल होने के बाद ही भाजपा राम मंदिर मुद्दे को लेकर अपना अभियान शुरू किया है। यदि ब्रिक्स में भारतीय कुटनीति सफल हो गई होती तो उसे भी सर्जिकल स्ट्राईक की भांति यूपी के चुनाव में भाजपा भुनाने की कोशिश करती। फिलहाल, भाजपाई मायूस हैं और मोदी सरकार की विफलता की वजह से कांग्रेस का ग्राफ यूपी समेत पूरे देश में तेजी से बढ़ रहा है। चाहे तो कांग्रेस के इस बढ़ते ग्राफ को किसी भी पैमाने से नाप सकते हैं।

 

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indian national congress social media activist लेखक कवि सामाजिक चिंतक