पूरी दुनिया में मीडिया , पत्रकारिता और समाचार की हालत ठीक नहीं है।
शायद यह दौर हीं हैं तोड़-मरोड़ कर बोलने वालों का । यहाँ मिर्च – मसाला लगी और चटपटी बातों को लाजवाब माना जाता है और यह हाल पूरी दुनिया का है , किसी एक देश का नहीं।

जब से कट्टर राष्ट्रवाद ने पूरी दुनिया को अपनी जद में लिया तब से मीडिया और पत्रकारिता ने भी दम तोड़ना शुरू कर दिया। एक-एक करके कई देशों ने अपने लिए हिटलर के समान शासक का चुनाव कर लिया। अब जब हिटलर आपका शासक होगा तो “हिटलर-गिरी” भी होगी हीं ।

हिटलर के दौर को पढ़ेगें तब जानेगें कि वो स्वयं को बहुत बड़ा देशभक्त बताता था। वह जनता के सामने रोता था , गिड़गिड़ाता था , जनता को बहलाता और फुसलाता है। वो दिखलाता था कि उसके लिए देश पहले है और वह सिर्फ देश के लिए समर्पित है।
आप जब हिटलर को पढ़ेगें तो जानेगें कि उसको जनता का अपार समर्थन प्राप्त था। उसकी बातें सभी को सच लगती थीं।
फिर धीरे-धीरे हिटलर ने अपना असली रंग दिखाना शुरू किया । मगर जबतक जनता जागती तबतक उनका देश बर्बाद हो चुका था।

इतिहास गवाह है कि जब भी दुनिया में कहीं भी क्रूर शासनकाल आया तब शासक घोर राष्ट्रवादी हुआ करता था ।
इतिहास इस बात का भी गवाह कि “कलम” क्रूर शासकों का निशाना हुआ करता था ।
निडर होकर लिखने-बोलने वालों को दबाया जाता था ताकि उनकी कलम जनता को सच ना पढ़ा सके ।
लेकिन पत्रकारिता ने हमेशा झूठ को बेनकाब किया ।

मेरी नजर में राष्ट्रवाद गंदा शब्द नहीं है। हर देश में यह होना चाहिए । आखिर देश की जनता अपने देश से प्यार नहीं करेगी तो सुरक्षा कैसे करेगी ? राष्ट्रवाद ने हीं हिंदुस्तान को आजाद करवाया । राष्ट्रवाद होना जरूरी है लेकिन कट्टर राष्ट्रवाद की कहीं जगह नहीं होनी चाहिए ।
अगर आपका राष्ट्रवाद मानवाधिकार को कुचल रहा है तो वह राष्ट्रवाद नहीं हिटलर-वाद है।
आपको फर्क समझना होगा।

पहले कम-से-कम इस बात की संतुष्टि होती थी कि चलो कुछ न सही मगर पत्रकार हमें हकीकत से रूबरू करवायेगा , सच दिखाएगा , पढ़ायेगा ।
लेकिन उपभोक्तावादी संस्कृति ने हमारे न्यूज चैनलों , अखबारों , पत्रिकाओं और पत्रकारों को भी बदल दिया।
अब पूरी दुनिया रियल और फेक न्यूज के जाल में फंसी है। कभी-कभी तो दिन की सारी खबरें फर्जी होती हैं।

भारत में 4-5 सालों में बहुत हद तक मीडिया के रूप-रंग में अविश्वसनीय परिवर्तन आया है।
हमारे यहाँ मीडिया काॅरपोरेट घरानों के हाथों बिक गई है। यहाँ वैसे भी पढ़े-लिखे मूर्खों की संख्या अन्य देशों से ज्यादा है।
यहाँ न्यूज चैनल और धारावाहिक चैनल में कोई फर्क नहीं बचा है। न्यूज बुलेटिन भी किसी सीरियल से कम नहीं लगते हैं।
पत्रकार अब सरकारों की गोद में खेलने लगे हैं।

भारत में अब मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ की जगह दल विशेष का चौथा हाथ बन गई है।
यहाँ पहले से हींं सोसल मीडिया का इस्तेमाल फर्जी खबरों को फैलाने के लिए किया जा रहा था , अब तो प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी इसी काम को अंजाम दे रहे हैं।

यहाँ सवाल और निशाना विपक्ष पर होता है सत्ता पक्ष पर नहीं ।
महंगाई , महिला सुरक्षा , घोटाला , कालाधन जैसे मुद्दों की जगह अब मंदिर , मस्जिद , गाय , गोबर ने ले ली है।
भारतीय मीडिया स्वयं आपसे सच छुपाती है , मुद्दों को भटकाती है , खबर नहीं दिखाती , फेक न्यूज परोसती है , सरकार को बचाती है , दंगे करवाती है , सौहार्द बिगाड़ती है।

दिल्ली के रामजस काॅलेज का विवाद आपको याद होगा।
गुरमेहर कौर भी याद होगी और उमर खालिद भी याद होगा।
रामजस काॅलेज में 21 फरवरी को एक सेमिनार का आयोजन किया गया था जिसका नाम था “कल्चर ऑफ प्रोटेस्ट” । इस सेमिनार में उमर खालिद को बुलाया गया था ।
ABVP इसका विरोध कर रही थी । छात्रों के दो गुटों में मारपीट हुई और आरोप लगा कि वहाँ वामपंथी छात्रों ने देश विरोधी नारे लगाएं।

गुरमेहर कौर ABVP की गुंडागर्दी के खिलाफ सामने आईं पर बड़े-बड़े लोगों और मीडिया ने उनको इतना परेशान किया कि अंततः उन्होनें अपने कदम पीछे कर लिए ।

मीडिया ने देशद्रोह , आजादी और राष्ट्रवाद के नाम पर पूरा देश जला दिया । JNU के वक़्त भी मीडिया ने दल विशेष के साथ मिलकर देश को गुमराह किया था ।
अब रामजस विवाद पर नया तथ्य सामने आया है मगर मीडिया ने आपको नहीं दिखाया।

दरअसल पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जिस वीडियो के आधार पर देशविरोधी नारेबाजी का आरोप लगा है, शुरुआती जांच में लगता है कि उससे छेड़छाड़ की गई है ।
मतलब सब झूठ था ।

मीडिया आपका ब्रेन वाॅस कर रही है । आपको असहनशील बना रही है । सरकार के साथ मिलकर आपको गुमराह कर रही है।
विपक्ष को तो कमज़ोर कर ही दिया है आपने । अब लोकतंत्र को कौन बचाएगा ?
जो मीडिया खरीद – फरोख्त करके सरकार बनाने को रणनीति बताती है , सवाल सरकार की जगह विपक्ष से करती है और विपक्ष के नेताओं पर चुटकुला बनाती है वह लोकतंत्र को बचा रही या बेच रही है?

कैसे बचें गोदी मीडिया से ?
जरुरत है कि ऐसे दौर में हम आंखें और दिमाग खोलकर सही खबर पहचानें , तुरंत रिएक्ट ना करें , असहनशील न बनें , कट्टर राष्ट्रवाद को खारिज करें और अपने मुद्दे तय करें ।
हमें क्या देखना है , क्या पढ़ना है , यह हमें मालूम होना चाहिए ।
मीडिया के साथ-साथ सोसल मीडिया पर भी नज़र रखें क्योंकि वह ज्यादा खतरनाक है।

Comments