मई 2014 में आम चुनाव के नतीजे आने के बाद हर न्यूज़ चैनल और अखबार में सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र मोदी जी के चर्चे थे। करीब एक साल तक हर अखबार मोदी जी के किस्सों से भरा होता था। दुःख में बीता बचपन, गरीबी का दंश, घर छोड़ कर जाना वगैरह वगैरह। आज के डिजिटल युग में न्यूज़ चैनल कहाँ पीछे रहने वाले थे। हर चैनल पर मोदी जी के जीवनी का नाट्य रूपांतरण प्रसारित किया जा रहा था। इन सबमें सबसे चर्चित हुआ था एबीपी न्यूज़ पर आने वाला मोदी जी के जीवनी पर आधारित नाट्य रूपांतरण। इसके शुरूआती दृश्य में दिखाया गया था कि एक नवबालिग रेलवे प्लेटफार्म पर चाय बेच रहा होता है, ट्रैन धीरे धीरे प्रस्थान करना शुरू करती है, वो नवबालिग चाय लेकर दौड़ता है और वो प्लेटफार्म पर चाय समेत गिर जाता है। बिल्कुल बॉलीवुड में बन रही 70 के दशक के किसी फिल्म की तरह।

मोदी जी जब तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे उन्हें यह कभी प्रचारित करने की जरूरत नही पड़ी कि उन्होंने किसी गरीब ओबीसी या दलित ( जो चुनावी रैली के साथ बदलता रहता है) के घर जन्म लिया हो और उनका बचपन गरीबी मे बिताया है । ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने दंगों के आधार पर विराट हिन्दू की छवि बना ली थी तथा समाज के मजबूत पाटीदार वर्ग का उन्हें समर्थन प्राप्त था। राष्ट्रिय स्तर के राजनीति में उतरते के बाद उन्हें न सिर्फ अपनी गरीबी बल्कि हर रैली के साथ बदलती जाति की भी याद आने लगी।

● अब आते हैं मोदी जी के असली चरित्र पर। जैसा की प्रचारित है मोदी जी ने गरीब परिवार में जन्म लिया तथा अपने जीवन के लंबे समय तक गरीबी के दंश को झेला है लेकिन इसका कैसा प्रभाव उनके व्यक्तित्व और सोच पर पड़ा यह समझना जरूरी है-

– पूरे दिन में अगर चार सभाओं को संबोधित करना हो तो चार बार कपडे बदलना, 10 लाख का सूट पहनना, महंगी विदेशी घड़ीया और चशमे, काजू के आटे की रोटी खाना, 30000 रूपये किलो वाले मशरूम की सबजी खाना, क्या कोई व्यक्ति जो गरीबी मे बचपन बिताया हो, ऐसा करता है?

– मोदी जी को जब देश की कमान मिली तो उनका सबसे पहला कदम था भूमि अधिग्रहण कानून मे बदलाव । इस कानून के तहत यूपीए सरकार ने किसानों और खेतिहर मजदूरों को उनके जमीन का हक दिया तथा बिना इजाजत और पूरा मुआवजा दिए बिना सरकार जमीन नही छीन सकती । लेकिन मोदीजी ने इस कानून को खत्म करने में पूरा जोर लगा दिया, तीन बार अध्यादेश लाये लेकिन भारी विरोध के बाद उन्हे अपना अध्यादेश वापस लेना पड़ा।  लेकिन गरीबो से जमीन छीनने का इरादा साफ दिखाई दिया।  क्या कोई व्यक्ति जो गरीबी मे बचपन बिताया हो, गरीबो की जमीन छीनता है?

– मनरेगा जैसी योजना जिससे देश के करोड़ों अशिक्षित और गरीब लोगो को साल में 100 दिनों के रोजगार की गारंटी मिलती है उसका उन्होंने संसद में मजाक उड़ाया । गरीबों का एक बड़ा वर्ग को इसी मनरेगा योजना के कारण गरीबी रेखा के नीचे से निकलकर आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा मिली। लेकिन मोदीजी ने मनरेगा का गला घोटने का हर संभव प्रयास किया । क्या कोई व्यक्ति जो गरीबी मे बचपन बिताया हो, गरीबो से रोजगार छीनने की कोशिश करता है?

– नोटबंदी से होने वाले नुकसान सबसे अधिक देश के निचले तबके को हो रही है। कल कारखानों के उत्पादन में कमी आने के कारण लाखों की संख्या में कामगारों की छंटनी की जा रही है, जिसकी वजह से उन गरीबों के बीच दिन के दो जून के खाने की समस्या खड़ी हो गई है। माना की नोटबंदी से 1% अमीर लोगो पर नकेल कसी गई लेकिन 99% गरीब लोगो के उपर कहर है । क्या कोई व्यक्ति जो गरीबी मे बचपन बिताया हो, ऐसी योजना लागू करता है जिससे 99% गरीब लोगो पर कहर साबित हो ?

ऐसे अनेकों उदाहरण प्रस्तुत किये जा सकते हैं जो मोदी जी की “गरीबों” के विरुद्ध मानसिकता को प्रमाणित करती है। दरअसल मोदीजी गरीबी को नही बल्कि गरीबो को ही खत्म कर रहे है!

मनमोहन सिंह जी का जन्म भी अत्याधिक गरीब परिवार में हुआ था, परंतु शिक्षा के प्रति ललक होने की वजह से उन्होंने देश विदेश में न सिर्फ कामयाबी बल्कि शोहरत भी खूब कमाया। उनके पास ज्ञान का विस्तृत भंडार था जिसका उपयोग उन्होंने अपने दस साल के कार्यकाल में तरह तरह के जनकल्याणकारी योजनाओं को किर्यान्वित करने में उपयोग किया। डॉ मनमोहन सिंह ने अपनी गरीबी का न कभी रोना रोया और न कभी बेचारगी भरे भाव से वोट बटोरने का प्रयास किया। आंकड़े गवाह है कि उनके 10 वर्षों के कार्यकाल में सर्वाधिक संख्या में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों के जीवन स्तर में सुदृणता आई थी।

मोदी जी के लिए अपना ‘गरीबी मे बिताया बचपन’ का रोना रोना और गरीबो के प्रति लगाव दर्शाना सिर्फ एक छलावा और वोट बटोरने का हथकंडा है वर्ना गरीब विरोध नीतीया लागू करके देश के करोड़ो गरीब लोगो को चोट नही पहुंचाते ।

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