नमस्कार रविश जी

आपको क्या वाक़ई ऐसा लगता है की आपके कहने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता? क्या आपको ख़ुद आपकी पत्रकारिता पर शक है? और अगर ऐसा है तो आप उन दिए हुए सम्मान के हक़दार नहीं हैं, उस प्यार के हक़दार नहीं हैं जो हम दर्शकों की तरफ से आपको मिलता है।

रविश जी, आपने नकारात्मकता की हद दिखाई ,उसपर मैं कोई टिपण्णी करना ही नहीं चाहती जो आपने कहा ,क्योंकि अब तो बात ख़त्म हो गई और आपका एक एपिसोड बनकर ,टीवी पर चल भी  गया, लेकिन आपके लेख ने उस एपिसोड का परिणाम तो दिखा ही दिया।

सुरक्षा का एहसास आपको भी है,आजकल आपके कर्यक्रम में जनसँख्या की गणना और मानसिक रोगियों पर किया प्राइम टाइम ये बता रहा है कि आपको भी अपनी सुरक्षा का एहसास है, तो राहुल की सुरक्षा का एहसास क्यों नहीं सर!? एक ब्लास्ट में देश का भविष्य ख़त्म हो गया था सर (राजीव जी) । बोलने से अगर नेता की कैपिबिलिटी मापी जा सकती है ,तो आज बोलने वालों ने देश का क्या हाल किया है वो आपके भी सामने है, लोगों के दिमाग़ में ज़हर बोया जा रहा सर जिसपर मैंने आपके प्राइम टाइम में कभी बहस होते नहीं देखा।

और ये क्या था सर! कि शहर में किसान की बात कर रहे, मैं शहर में रहती हूँ और मेरे चाचा,बाबा,भाई खेती करते हैं,मेरे लिए तो किसान के लिए क्या हो रहा जानना बहुत ज़रूरी है क्योकि मेरे घर अन्न गांव से आता है,ये यूपी है जहाँ आधे लोग गांव से शहर के चक्कर काटते रहते हैं।क्या आप नहीं जानते?

 

आभार! कि आपने एक कार्यकर्त्ता की मनः स्थिति समझी लेकिन उस कार्यकर्त्ता का बार-बार आपको सम्हालना मैं समझातीं हूँ,.. वो आपको नहीं आपकी पत्रकारिता को सम्हलने के लिए कह रहा था, वो अपनी शालीनता से आपमे भी कुछ सच और शालीनता को कायम रखने को कह रहा था, वो कह रहा था कि मुझे बाइट देकर आप अपनी पत्रकारिता नहीं सिद्ध कर पाएंगे, ..सर! उस कार्यकर्त्ता ने आपकी तो इज़्ज़त की लेकिन आप अपनी ही पत्रकारिता की इज़्ज़त करने में चूक गए।

 

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