बैसवारे के बोल
काशी कब बनेगा क्वेटो!
रायबरेली। काषी को क्वेटो बनाने की तैयारी जोर शोर से चल रही है। अपने प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर भाई मोदी जी जापान भी हो आये। लगभग 35 अरब डालर की भारी भरकम रकम हिन्दुस्तान लाने का भरोसा भी जापानियों से लेकर लौटे हैं। इस 35 अरब डालर मे से कितने रू काषी पर खर्च होगंे यह तो नही पता है लेकिन इस बात का अंदाजा जरूर हो चला है कि बाबा विष्वनाथ की नगरी का विकास महात्मा बुद्ध के अनुयायियों की अनुकम्पा पर ही होगा।
’एक माउस पर सारी दुनिया चलती है’ ’3 डी यानी डेमोक्रेसी डेमांLट्रेसी और डिमांन्ड’ ’रेड टेप’ नही ’रेड कारपेट’ ’क्लीन इंडिया’ और ’मेक इन इंडिया’ जैसे ’बौद्धिक लफ्फाजी’ भरे नारो से देष के विकास का आगाज हो रहा है। देष के बनते बिगडते ऐसे माहौल मे काषी को सजाने सवारने को ठेका क्येटो ने लिया है।
काषी की पहचान बाबा विष्वनाथ की नगरी के रूप मे आदिकाल से रही है। नक्काषी और कलाकारी का बेहतरीन नमूना बनारसी साडियांे की धूम पूरे संसार मे बरकरार हैं। बनारस को उस्ताद विस्मिलाह खान की धुन से भी जाना जाता है। संगीत कला और अध्यात्म के इस अत्भुत संगम की नगरी काषी को संवारने का काम जापान की ऐतिहासिक राजधानी रहा क्येटो शहर करेगा जो कभी जापान के सम्राट के सबसे रिहायषी पसंदीदा स्थानो मे से एक रहा हो। लगभग 14 लाख की आबादी वाले क्येटो शहर की पहचान जापान के सबसे अधिक आमदनी वाले पयर्टन स्थलो मे से एक की रही है।
निष्चित रूप से क्येटो काषी की सडकों को साफ सुथरा बनाने मे मददगार होगा। काषी के पवित्र घाटों को अतिआधुनिक रूप देकर पर्यटकों को आकषित करने मे भी कामयाब हो सकेगा। लेकिन काषी की संस्कृति को बदलने का यह अनथक प्रयास कहां तक कामयाब होगा,यह अहम सवाल है। काषी की गलियों की चहल पहल , बनारसी पान की महक, कूडों के ढेर पर अपना भाग्य तलाषते नौनिहाल, पंडो की रंगबाजी, नौजवानों की ठिठोली, बनारसी होली, और काषी के पंडितो की विद्वता को क्येटो के सांचे मे ढालने के दुष्परिणाम की कल्पना से एक बार मन जरूर सिहर उठता है। मेै दुष्परिणाम इसलिए कह रहा हॅूं कि आधुनिकता और अध्यात्म का कोई मेल कभी भी नही रहा है।
क्येटो का कल्चर, और काषी की सामाजिकता क्या कभी एक जैसी हो पाएगी । इसमे मुझे पूरा संदेह है।

दिलीप कुमार सिंह

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