Highlights ऑस्ट्रिया के राष्ट्रपति चुनाव और दक्षिणपंथियों का उदय

ऑस्ट्रिया के राष्ट्रपति चुनाव और दक्षिणपंथियों का उदय

8
An exhibition advertisement on the occasion of the 100th anniversary of the death of former Austrian Emperor Franz Joseph is seen betweeen presidential election campaign posters of Alexander Van der Bellen (L), who is supported by the Greens, and of Norbert Hofer (R) of the FPOe in Vienna, Austria, September 11, 2016. Slogans read: "To decide reasonably" (L) and "Power needs supervision". REUTERS/Heinz-Peter Bader

चार दिसम्बर को ऑस्ट्रिया में घोषित हुए राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे वास्तव में चौकाने वाले थे और उतने ही चौकाने वाले रहे इन चुनावो से जुड़े घटनाक्रम जिसने इस बार यूरोप को राजनीति को हिला कर रख दिया है .दरसल ऑस्ट्रिया में राष्ट्रपति चुनाव इस बार दो चरणों में हुए , पहले चरण में राष्ट्रपति दौड़ के लिए सभी योग्य उम्मीदवार चुनावी प्रतिस्पर्धा में उतरते है , ये चरण अक्सर बहु कोणीय मुकाबला होता है और राष्ट्रपति नियुक्त होने के लिए कुल पड़े मतों में से पचास प्रतिशत मत जिस उम्मीदवार के पक्ष में पड़ते है वो प्रत्याशी राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचित हो जाता हैं , परन्तु द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ये पहली बार हुआ की कोई भी प्रत्याशी चुनावों में बहुमत पाने के लिए और राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए अनिवार्य पचास प्रतिशत मत भी प्राप्त नही कर पाया, इसलिए अब राष्ट्रपति चुनाव अपने दुसरे चरण में प्रवेश कर चुका था .

24 अप्रैल को घोषित हुए राष्ट्रपति चुनाव के पहले चरण के चुनावी परिणाम कुछ इस प्रकार रहे –

1.नॉर्बर्ट होफर-(नेता- दक्षिणपंथी फ्रीडम पार्टी) – 35.1 प्रतिशत वोट

2.अलेक्जांडर फान डेअ बेलेन-(स्वतंत्र उम्मीदवार/ग्रीन पार्टी के भूतपूर्व अध्यक्ष) – 21.3 प्रतिशत

3.इरमगार्ड ग्रिस-(स्वतंत्र उम्मीदवार/सर्वोच न्यायलय के भूतपूर्व राष्ट्रपति) – 18.9 प्रतिशत 

4.रुडोल्फ हुन्डस्टोरफर-(नेता -सोशल डोमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ ऑस्ट्रिया-SPO) – 11.3 .प्रतिशत

5.आन्द्रेअस खोल-(भूतपूर्व राष्ट्रपति- ऑस्ट्रियन पीपल पार्टी –OVP)- 11.1 प्रतिशत

6.रिचर्ड लुग्नर –(स्वतंत्र उम्मीदवार)– 2.3 प्रतिशत

इन चुनावी परिणामों से ये साफ हो गया की ऑस्ट्रिया में दक्षिणपंथियों को जबर्दस्त बढ़त मिल रही थी ,  नॉर्बर्ट होफर जो दक्षिणपंथी फ्रीडम पार्टी के चुनावी उम्मीदवार थे इन चुनावों में अपने  चीर प्रतिद्वंदी , ग्रीन पार्टी के अलेक्जांडर फान डेअ बेलेन से 14 प्रतिशत के अंतर से आगे चल रहे थे , परन्तु फिर भी कोई भी नेता पचास प्रतिशत वोट हासिल करने में विफल रहा था . परन्तु चौकाने वाली बात ये भी रही की की SPO और OVP पार्टियों के कद्दावर उम्मीदवार भी दुसरे चरण में अपनी जगह नही बना सके .

मुकाबला अब दुसरे चरण में प्रवेश कर चुका था अब सिर्फ दो ही उम्मीद्वार चुनावी अखाड़े में थे नॉर्बर्ट होफर और अलेक्जांडर फान डेअ बेलेन क्यूंकि दोनों ने प्रथम चरण में सर्वाधिक वोट प्राप्त किये थे इसलिए अब मुकाबला केवल दोनों प्रत्याशियों के बीच  ही होना था. 23 मई 2016 को घोषित हुए दुसरे दौर के चुनावी परिणामों में ग्रीन पार्ट्री के अलेक्जांडर फान डेअ बेलेन ने फ्रीडम पार्टी के प्रत्याशी नॉर्बर्ट होफर को तकरीबन तीस हजार आठ सो वोटों से परास्त किया . जीत का अंतर बेहद ही कम था ,फ्रीडम पार्टी के प्रत्याशी को मिले कुल 49.65 प्रतिशत वोट और ग्रीन पार्ट्री के के प्रत्याशी को मिले कुल 50.35 प्रतिशत वोट .

परन्तु इस चुनावी कहानी में तब एक दिलचस्प मोड़तब आ गया जब ऑस्ट्रिया के सबसे बड़े समाचार पत्रिका क्रोनेंन जेईतुंग (Kronen Zeitung) ने  विभिन चुनावी शेत्रों में हुई चुनावी अनियमिताओं  और चुनावी  धांधलियों की खबर  छाप दी  और आठ जून तक फ्रीडम पार्टी ने इन चुनावी परिणामों को संवैधानिक कोर्ट में घसीटने की घोषणा कर दी . अब मामला कोर्ट में था और 1 जुलाई को ऑस्ट्रिया के संवैधानिक कोर्ट ने चुनाव में हुई अनियमिताओं और धांधलियों का संज्ञान लेते हुए दुसरे चरण  के चुनावी परिणामों को अमान्य करार दे दिया और दुसरे चरण के चुनाव फिर से कराने के आदेश दिए .वैसे दुसरे चरण के चुनाव की सम्भावित तारीख 1 अक्टूबर थी परन्तु अभी चुनाव और आगे टलने थे और चुनाव टलने का कारण भी काफी हास्यास्पद और विवादास्प्क रहा. ऑस्ट्रिया में खराब गोंद ने आखिरकार राष्ट्रपति पद का चुनाव टलवा ही दिया . चुनाव के दौरान लोगो ने ये शिकायत की थी कि डाक से भेजे जाने वाले मतपत्रों के लिए जो लिफाफे आए हैं उनमें लगे गोंद से वे चिपकते ही नहीं। इससे उन्हें कोई भी खोल सकता है और उनके वोट की गोपनीयता भंग हो सकती है .

आखिरकार दुसरे चरण की चुनावी तारीख 4 दिसम्बर तय हुई परन्तु चुनावी परिणाम एक दम उलट रहे और इस बार जीत ग्रीन पार्ट्री के अलेक्जांडर फान डेअ बेलेन की हुई जिन्होंने फ्रीडम पार्टी के प्रत्याशी नॉर्बर्ट होफर को तीन लाख अड़तालीस हज़ार वोटो से भी अधिक अंतर के वोटो से हराया. 4 दिसम्बर को हुए चुनाव के परिणाम कुछ इस प्रकार रहे –

1.अलेक्जांडर फान डेअ बेलेन -वोट मिले- 2,472,892   वोट प्रतिशत – 53.79% 

2. नॉर्बर्ट होफर-वोट मिले- 2,124,661 , वोट प्रतिशत – 46.21%

इस पुरे चुनावी घटना क्रम से कुछ संकेत एक दम स्पष्ट आ रहे हैं –

1.दक्षिणपंथ की तरफ ऑस्ट्रियाई समाज का बढ़ता झुकाव – दुसरे चरण में पैंतालिस प्रतिशत से अधिक वोटरों ने दक्षिणपंथी फ्रीडम पार्टी के प्रत्याशी को अपना मत दिया , जिसका अर्थ येही निकाला जा सकता है की समाज में ध्रुवीकरण और इस्लामोफोबिया का प्रभाव बढ़ता जा रहा है और हाल ही में यूरोप में हुई आतंकवादी घटनाओं की कारण सरकार को उदारवाद , आप्रवासन और आतंकवाद से जुड़ी नीतियों पर जनता से काफी मुश्किल प्रश्नों का सामना करना पड़ रहा है और विरोध भी झेलना पड़ रहा है. इसी ध्रुवीकरण के चलते पहले चरण में 68.5 प्रतिशत वोटिंग हुई , दुसरे चरण में 72.7 प्रतिशत वोटिंग हुई और “फिर से हुए दुसरे चरण” के चुनाव में 74.2 प्रतिशत वोटिंग हुई . वोटिंग दर में वृद्धि चुनावो के समय हो रहे समाजिक ध्रुवीकरण की तरफ इशारा करती हैं जो की दक्षिणपंथियों के लिए अक्सर फायदे का सौदा ही होता है , ऐसी परीस्थितयों में उनकी जीत की आशंका में काफी वृद्धि हो जाती है.

ऑस्ट्रिया का समाज 2015 में अपने चरम पर पहुंचे सीरियन शरणार्थी संकट से अब भी जूझ रहा है, 2015 के खत्म होते होते 90000 शरणार्थियों के “शरण आवेदन” ऑस्ट्रिया प्राप्त कर चुका था और तकरीबन 8 लाख से ज्यादा शरणार्थी ऑस्ट्रिया के रस्ते यूरोप के दुसरे देशों की तरफ पलायन कर चुके थे. अप्रैल 2016 में ऑस्ट्रिया की सरकार ने सख्त नीति अपनाते हुए शरणार्थियों को अपनी देश की सीमा में स्वीकार करने की शमता 37500 तक सिमित कर दी. इतने बड़े स्तर पर सीरियाई शरणार्थियों के यूरोपियन पलायन से अर्थव्यवस्था पर आर्थिक दबाव तो बढ़ा ही है समाजिक और राजनैतिक ध्रूविकरण के माहौल भी प्रबलता से बनता हुआ दिखा है. दक्षिणपंथी “फ्रीडम पार्टी” के प्रत्याशी नॉर्बर्ट होफर ने अपने पुरे चुनावी कैंपेन में “सीरियन शरणार्थीयों” के विषय में सरकार द्वारा अपनाई जा रही उदार आप्रवासन नीतियों का जमकर विरोध किया, उन्होंने सिर्फ अपने ही देश के उदारवादी नेताओं के आड़े हाथो नही लिया , जर्मनी की चांसलर एंजेला मेर्केल की भी इस विषय पर अपनाई जा रही नीतियों की खुलकर आलोचना करी . नॉर्बर्ट होफर ने ऐसी उदारवादी आप्रवासन नीतियों और “सीरियन शरणार्थीयों” से जुड़ी सभी नीतियों को यूरोप में पनप रहे इस्लामिक आतंकवाद के लिए जिम्मेदार ठराया . हालाँकि नॉर्बर्ट होफर यूरोपियन यूनियन के पक्षधर हैं पर वो तुर्की के और तुर्क मुसलमानों के यूरोपियन यूनियन में शामिल होने के जमकर विरोध में हैं .वो अपने चुनावी कैंपेन में ये स्पष्ट कर चुके है की वो “शरिया कानून ” और  “राजनैतिक इस्लाम ” के देश और यूरोप की राजनैतिक व्यवस्था में हो रही दखलंदाजी और बढ़ रहे प्रभाव के सख्त खिलाफ हैं और ऐसे किसी भी विचारधारा से सख्ती से निपटने की वकालत करते हैं जो इस्लामिक आतंकवाद का पोषण करती हो .

2.आर्थिक मोर्चे पर लोगो की सरकार से बढ़ती निराशा  – 

ऑस्ट्रिया से आए इन चुनावी नतीजों ने ये भी स्पष्ट संकेत दिए की लोगो में मौजूदा सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर काफी असंतोष है. कहने को ऑस्ट्रिया यूरोपियन यूनियन का चौथा धनी राष्ट्र है और यहाँ की अर्थव्यस्था की जीडीपी का 15 प्रतिशत हिस्सा पर्यटन से आता है. परन्तु ऑस्ट्रिया की अर्थव्यवस्था 2008 से पहले के उच्च विकास दर के आंकड़ो को फिर से नही छू पाई हैं. ऑस्ट्रिया में बेरोजगारी की दर पर भी अगर नजर डाली जाये तो पता चलता है की जहाँ बेरोजगारी की दर साल 2009 मध्य में 6.5 प्रतिशत से भी कम थी वही अब ये बेरोजगारी की दर साल 2016 में 9 से 10 प्रतिशत के बीच रही है.

ऑस्ट्रिया के जाने माने थिंक टैंक “एजेंडा ऑस्ट्रिया” ने भी ऑस्ट्रिया की भविष्य में प्रतिस्पर्धा करने के क्षमता पर भी सवालिया निशान छोड़ा है ,जिनके अनुसार दस में से आठ यूरो प्रोजेक्ट या प्लांट के रखरखाव में खर्च हो रहे हैं और सिर्फ दो यूरो ही नये प्लांट या नये प्रोजेक्ट के निर्माण में खर्च हो रहे हैं . लोगो में ये मान्यता प्रबल होती जा रही है की मोजुदा सरकार की आर्थिक नीतियाँ एक स्थिर अर्थव्यवस्था की जगह एक मंद पड़ी अर्थव्यवस्था को जन्म दे रही है .

आर्थिक मुद्दों पर नॉर्बर्ट होफर ट्रम्प मॉडल को अपनाते दिख रहे है जो की अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के लिए टैक्स रेट में कटौती और आधारभूत ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर ) के विकास और विस्तार को काफी महत्व देते आए हैं. परन्तु रोजगार के मुद्दे पर नॉर्बर्ट होफर यूरोपियन यूनियन से टकराव की स्थिति में दिख रहे हैं क्यूंकि यूरोपियन यूनियन में श्रमिकों की मुक्त आवाजाही का प्रवधान है और नॉर्बर्ट होफर विदेशी आव्रजन की वजह से घटे रोजगार के अवसरों को पहले ही एक चुनावी मुद्दा बना चुके हैं . उनकी आर्थिक नीति का एक उद्देश्य ऑस्ट्रियाई नागरिकों को रोजगार के अवसर मोहैया कराना भी है
रूस के साथ संबंधो पर नॉर्बर्ट होफर की लुक ईस्ट नीति रही है , ताकि ऑस्ट्रिया पर रूस द्वारा लगाये गये आर्थिक प्रतिबन्ध हटा सके और रूस के साथ नये आर्थिक संबंध स्थापित किये जा सके जो की ऑस्ट्रिया की आर्थिक विकास के लिए सहायक होंगे . इसी लुक ईस्ट नीति के चलते रूस और ऑस्ट्रिया की फ्रीडम पार्टी के बीच एक समझौता भी हुआ है जिसके तहत दोनों देशों के बीच बैठकों सभाओं और कार्यक्रमों के आयोजनों के माध्यम से आर्थिक और सामजिक रिश्तों को मजबूत करने की प्रतिबद्धता दर्शायी गयी है .

इन चुनावों में हार भले ही नॉर्बर्ट होफर जैसे घोर दक्षिणपंथी की हुई हो पर परन्तु इस हार की बदौलत फ्रीडम पार्टी ऑस्ट्रिया की राजनीति में अपनी जड़े भुत मजबूत बना चुकी है और ऑस्ट्रिया की जनता को अब एक वैकल्पिक राजनैतिक विचारधारा स्पष्ट तौर पर उभरती हुई दिख रही है, उदारवादियों या फिर सोशलिस्टो के लिये ये चुनावी दौर काफी उथल पुथल का रहा जीत का अंतर भी काफी कम रहा और जिस तरह अर्थव्यवस्था , आतंकवाद ,इस्लामोफोबिया और सिरीया से हो रहे शरणार्थियों के पलायन के मुद्दे पर ऑस्ट्रिया के समाज का ध्रुवीकरण हुआ है उससे ये साफ झलकता है की आने वाले चुनावो में उदारवादियों या फिर सोशलिस्टो का बहुमत में फिर से आना काफी मुश्किल साबित हो सकता हैं . निश्चित तौर पर ये एक ऐसी हार है जो दक्षिणपंथियों में तो भविष्य की जीत का जोश भर गयी है और उदारवादियों या फिर सोशलिस्टो के खेमे में भविष्य को लेकर अनिश्चितता और व्याकुलता बढ़ा गयी है . परन्तु एक बार के लिए ही सही नॉर्बर्ट होफर और फ्रीडम पार्टी की हार ने पुरे यूरोप में उदारवादियों राहत की साँस जरुरु दी है .

 

 

Note – Editorial first published at

https://chaitanya-ganrajya.blogspot.in/2016/12/blog-post_23.html

 

Comments