16 मई 2014 की सुबह थी अभी सूरज की रोशनी सर तक भी नही पहुँची थी की दिल्ली की सत्ता पर कमल खिलखिला चुका था
नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली थी सोशल मीडिया से लेकर मोहल्ले के नुक्कड़ तक टीवी से लेकर ट्रेन के टिकट की लाइनों तक बस एक बात सबके ज़ुबान पर थी कि अच्छे दिन आगए, मुझे खुद को गुजरात के विकास मॉडल पर भरोसा होने लगा कि शायद पिछले 70 सालों की सरकारें निकम्मी थी जो देश को लूट कर चली गयी नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार से उम्मीद बढ़ने लगी थी
लगने लगा था कि महँगाई कम होगी, पाकिस्तान चीन आंख दिखाना बंद करके दिल्ली आकर भारत से पिछली की हुई गलतियों की माफी मांगेंगे, सबसे ज़्यादा इंतज़ार तो काले धन का था जिससे मुझे और भारत के हर नागरिक को 15 15 लाख मिलने वाले थे बात जब 2 करोड़ रोज़गार की थी तो अपनी भी नौकरी मिलने की उम्मीद सर चढ़ कर बोल रही थी
नरेंद्र मोदी के भाषणों में जिस बात का सबसे ज़्यादा ज़िक्र था वो था सबका साथ सबका विकास जिससे न कोई हिन्दू रहता न कोई मुस्लिम न सिख न ईसाई बल्कि सारे भारतीय हो जाते
लेकिन न जाने किसकी नज़र लग गयी हमारे प्रधानमंत्री और सरकार को की 24 घण्टे सातों दिन काम करने के बावजूद पेट्रोल ₹80 के पार पहुँच गया वो भी तब जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल का दम 49 डॉलर प्रति बैरल है जबकि मई 2014 में विफल UPA सरकार के समय ये दाम ₹70 थे जबकि कच्चे तेल का दाम 110 डॉलर प्रति बैरेल था
वादा था दो करोड़ नौकरियों का भी था लेकिन तीन साल पांच महीना बीतने के बाद नई नौकरियां तो छोड़िये लाखो लोग पुरानी नौकरोयो से हाथ धो चुके है नौकरियां मिलने के स्तर 2011 के मुक़ाबले 90 प्रतिशत गिर चुका है
नोटबंदी जैसे तुगलकी फ़रमान से जीडीपी 2% तक नीचे गिर चुकी है सारे लघु उद्योग बन्द होने के कगार पे खड़े है
3 साल में सिर्फ 3 बड़े काम किये है इस सरकार ने
धर्म के नाम पर लोगो को बांटा है गाय के नाम पर इंसानों को काटा है औऱ कांग्रेस के किये हुए कामों का बस केक काटा है।

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